पृष्ठ २२ – कुछ चुनें हुए मुक्तक

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फूलों से मिले घाव को काँटों से सी लिया
इक ही नज़र में रूप के सागर को पी लिया
पूरी सदी किसी ने शिकायत में काट दी
हम ने तो एक पल में ज़िन्दगी को जी लिया ।
—  वेद प़काश वटुक
( कैलाश पुरी , मेरठ उ प़ )

मिट्टी फसल उगाए, पूछे धर्म न किसी किसान का,
बेमानी हर ढ़ंग पुराना इंसानी पहचान का,
माँ की ममता,फूल की खुश्बू,बच्चे की मुस्कान का,
सिर्फ मौहब्बत ही मज़हब है,हर सच्चे इंसान का,।
लक्ष्मीशंकर वाजपेयी
( रंजनी कान्त शुक्ल के सौजन्य से )

दुःख का उसके सागर छलका |
जो था अन्दर बाहर छलका |
पीर बढी जब जब बिटिया की |
आँख का उसकी सागर छलका ||
डॉ अजय जनमेजय
( बिजनौर उ प़ )