पृष्ठ १८ – कविताएँ

पृष्ठ १८

दुर्लभ

सिर्फ़ देखना सुनना छूना
और सूँघना काफी है क्या ?
महसूसना अधिक ज़रूरी
किसी डबडबाई आँख की नमी को
आत्मसीमित लोगों में प्यार की कमी को
किसी उमड़ते दिल की ख़ुशी को
किसी आत्मघाती बेबसी को
महसूसे बिना
व्यर्थ है शब्दों के पिरामिड गढ़ना
उन में आशयों अभिप़ायों को
ममियों कि तरह
ख़ूबसूरत भाषा क़ीमती अलंकारों से सजा
किसी खोजी सैलानी की प़तीक्षा करना
जो भुले भटके वहाँ पहुँच
तमाशबीनों को परोसेगा
कुछ रहस्य कुछ पहेलियाँ
और ढेर सारी सनसनी
ऐसी ही दुर्लभ होती है
आदतन ज़बरन लिखी कविताएँ ।
— वेद प़काश अमिताभ
( डी १३१ रमेश विहार , अलीगढ़ उ़प़ )

सदानीरा की कोख

उस की कोख सदानीरा थी
अब वह उच्छृंखल निन्द
कहाँ बिलाया ?
जीवन रसमय करती
कलकल छलछल सुर में बहती
अपनी धुन में आगे पढ़ती
अब उस के आँचल का पानी सूख गया है
सूनी कर दी कोख किसी हत्यारे ने
कभी मिला तो पूछूँगा
क्यों कोख उजाड़ी सदानीरा की
सदियों से सींच रही थी
पुरखों की धरती को
तेरे जीवन की हरियाली
अब बच न सकेगी ।
— राम विनय शर्मा
( प़ाध्यापक , हिन्दी विभाग , महाराज सिंह पी जी कालेज
सहारनपुर २४७००१  उ प़ )